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सितारों की दूरी

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नील बहुत जिज्ञासु बच्चा था। उसे हर चीज़ के बारे में जानने की उत्सुकता रहती थी। एक दिन, वह अपनी दादी के साथ आंगन में बैठा था। आसमान में टिमटिमाते सितारों को देखकर उसने पूछा,

"दादी ! ये तारे कितनी दूर हैं?"

दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "बहुत-बहुत दूर, इतने दूर कि हम उनकी दूरी किलोमीटर में नहीं नापते। हम इसे प्रकाश-वर्ष में गिनते हैं।"

नील हैरान हो गया। "प्रकाश-वर्ष? ये क्या होता है?"

दादी ने प्यार से समझाया, "बिलकुल वैसे ही जैसे तुम एक साल में बहुत कुछ सीखते हो.... प्रकाश भी एक साल में बहुत लंबा सफर तय करता है। प्रकाश वर्ष दूरी मापने की एक इकाई है, जो बताती है कि एक साल में प्रकाश कितनी दूरी तय करता है। उसे हम प्रकाश-वर्ष कहते हैं।"

नील सोच में पड़ गया। "अगर हम उस दूरी को नाप ही न सकें, तो क्या प्रकाश का सफर रुक जाएगा?"

दादी ने सिर हिलाया, "नहीं बेटा, चाहे कोई देखे या न देखे, प्रकाश अपनी राह चलता रहता है—जैसे तुम सीखते रहते हो, चाहे कोई देखे या न देखे।"

नील ने आसमान की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। उसे समझ आ गया—हमें भी सीखते रहना चाहिए, बढ़ते रहना चाहिए, बिना रुके, बिना थके, चाहे कोई देखे या न देखे।



-कहानी: नीरज
-संपादन: निर्मला

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